एक रात, जीवन के कठिन दौर में, पूज्य महाराज जी माँ नैना देवी जी के मंदिर में बैठे रो रहे थे। उन्होंने माँ से कहा —
“हे माँ, या तो मृत्यु दे दो या इस जीवन में कोई अर्थ दे दो।”
उसी क्षण एक दिव्य महात्मा प्रकट हुए — श्री काशीनाथ महाराज जी, जो भगवान महादेव के समान तेजस्वी दिखते थे। उन्होंने पूज्य नीलकंठ जी के सिर पर हाथ रखकर कहा —
“बेटा, कोई तेरे आंसू नहीं पोंछेगा। अब तुझे खुद लोगों के आंसू पोंछने हैं।”
उन्होंने महाराज जी को नौ पवित्र वचन (Nine Sacred Vows) दिए —
- शक्तियों का प्रयोग कभी प्रसिद्धि के लिए नहीं करना।
- किसी के प्रति द्वेष या शत्रुता न रखना।
- सदैव विनम्र, करुणामय और निष्काम रहना।
- दीन-दुखियों की सेवा में तन, मन, धन समर्पित करना।
- संतों, गुरुओं, ब्राह्मणों और गायों का सम्मान करना।
- बेसहारा लोगों का सहारा बनना।
- जहाँ मंदिर न हो, वहाँ सनातन धर्म का प्रचार करना।
- स्वयं को महान न बताना, सदैव सेवा भाव में रहना।
- सनातन धर्म की रक्षा के लिए तन, मन, धन अर्पित करना।
इन वचनों ने एक साधारण “अनिल कुमार” को “परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री नीलकंठ कौशल जी महाराज” बना दिया — एक ऐसे संत, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन धर्म, सेवा और मानवता को समर्पित कर दिया।